२५ साल की राजनीतिक उदासीनता ने किसानों को किया बेहाल; पैनगंगा, वर्धा और इरई जैसी नदियां बहने के बावजूद सिंचाई से वंचित खेत
Rajura Water Crisis | राजुरा | विधानसभा क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। यहां कोयले की खदानें हैं, सीमेंट उद्योग हैं, पैनगंगा, वर्धा और इरई जैसी नदियां हैं तथा कृषि के लिए विशाल भूमि उपलब्ध है। इसके बावजूद किसानों को पर्याप्त सिंचाई सुविधा नहीं मिलती, गांवों में पेयजल संकट बार-बार सिर उठाता है और स्थानीय युवाओं के सामने रोजगार का प्रश्न कायम है। यह विरोधाभास केवल प्रकृति की विडंबना नहीं, बल्कि पिछले ढाई दशकों की विकास-प्राथमिकताओं, जल-प्रबंधन और राजनीतिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिस क्षेत्र की धरती से उद्योगों और सरकार को बड़े पैमाने पर आर्थिक लाभ मिलरा है, उसी क्षेत्र के किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए बारिश और किस्मत के भरोसे रहना पड़े, तो विकास के दावों की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
इस वर्ष खरीफ फसल को हुए नुकसान और कई गांवों में गहराते जलसंकट ने समस्या की गंभीरता और बढ़ा दी है। उपलब्ध स्थानीय विवरणों के अनुसार, विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से में खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। हालांकि, प्रभावित गांवों की संख्या, कुल कृषि क्षेत्र, सिंचाई के वास्तविक आंकड़े और फसल नुकसान का आधिकारिक विवरण सार्वजनिक अभिलेखों से सत्यापित किया जाना आवश्यक है। फिर भी मूल प्रश्न स्पष्ट है: नदियों, तालाबों और खनिज संपदा से संपन्न इस क्षेत्र में किसानों को सालभर पानी उपलब्ध कराने की ठोस व्यवस्था आखिर क्यों नहीं बन पाई?
राजुरा, कोरपना, जिवती और गोंडपिपरी तहसीलों में कृषि आजीविका का प्रमुख आधार है। लेकिन सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण अनेक किसानों को वर्ष में मुश्किल से एक खरीफ फसल पर निर्भर रहना पड़ता है। बारिश समाप्त होते ही खेतों की उत्पादकता, किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार पर संकट गहराने लगता है। गर्मियों में पेयजल की समस्या अलग से खड़ी हो जाती है। किसान के सामने सवाल केवल फसल बचाने का नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और अगले कृषि मौसम की तैयारी का भी है।
पैनगंगा और वर्धा जैसी नदियों के किनारे बसे गांवों तथा नदी तटवर्ती कृषि भूमि को सिंचाई का स्थायी लाभ नहीं मिलना विकास नियोजन की गंभीर कमी की ओर संकेत करता है। नदी में पानी मौजूद होना और उस पानी को खेतों तक पहुंचाने की व्यवस्था होना दो अलग बातें हैं। बैराज, लिफ्ट सिंचाई, नहरों, जलाशयों तथा वितरण प्रणाली के अभाव में नदी का पानी बहकर आगे निकल जाता है, जबकि किसान की जमीन सूखी रह जाती है।
सवाल यह है कि दशकों तक सत्ता में रहे जनप्रतिनिधियों ने नदी जल का वैज्ञानिक नियोजन करने, सिंचाई परियोजनाओं को पूरा कराने और सूखे की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कितनी ठोस पहल की? चुनाव के समय किसानों के हितों की कसमें खाने वाली राजनीति को अब परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति, खर्च और परिणामों का हिसाब देना चाहिए।
खदानों से राजस्व, लेकिन स्थानीय युवाओं के हिस्से में रोजगार नही?
राजुरा विधानसभा क्षेत्र में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) की खदानें औद्योगिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कोयला उत्पादन से आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं और सरकार को विभिन्न माध्यमों से राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन स्थानीय नागरिकों के सामने रोजगार, पर्यावरणीय प्रभाव और जल-संसाधनों के संरक्षण से जुड़े प्रश्न बने हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया जाता है कि खदानों में बाहरी राज्यों से आए कामगारों को अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलते हैं, जबकि स्थानीय युवाओं को उनकी अपेक्षा के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता। हालांकि, बाहरी राज्यों के युवाओं को ७० प्रतिशत रोजगार मिलने के दावे की पुष्टि के लिए कंपनीवार भर्ती आंकड़े, स्थायी एवं ठेका कर्मचारियों का विवरण और स्थानीय रोजगार संबंधी अभिलेखों की जांच से सामने आएगा।
यदि क्षेत्र की खनिज संपदा का दोहन हो रहा है, तो स्थानीय युवाओं के कौशल विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, पेयजल और पर्यावरण संरक्षण पर भी ठोस निवेश दिखाई देना चाहिए। केवल उत्पादन के आंकड़े और राजस्व की चर्चा करके विकास की सफलता घोषित नहीं की जा सकती। विकास का वास्तविक पैमाना यह है कि उससे स्थानीय नागरिकों के जीवन में कितना सुधार हुआ।
खदानों से निकलने वाले पानी का प्रबंधन कहां है?
कोयला खदानों में सुरक्षित खनन के लिए भूजल का पंपिंग के जरिए निष्कासन किया जाता है। इस पानी की मात्रा, गुणवत्ता, निकासी के स्थान और उसके पुनः उपयोग का वैज्ञानिक प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि खदानों से बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकाला जाता है, लेकिन उसका पर्याप्त उपयोग नहीं होने से एक ओर जलसंसाधन व्यर्थ बहते हैं और दूसरी ओर आसपास के गांवों में पेयजल तथा भूजल स्तर को लेकर चिंता बढ़ती है।
इस विषय में दो तथ्यों को अलग-अलग समझना जरूरी है। खदानों से पानी निकालना अपने आप में भूजल स्तर गिरने का एक संभावित कारण हो सकता है, लेकिन सभी गांव के कुएं या बोरवेल का सूखना केवल इसी कारण हुआ, ऐसा निष्कर्ष वैज्ञानिक जांच के बिना नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए खदानों की जल-निकासी के आंकड़े, भूजल सर्वेक्षण, वर्षा के रिकॉर्ड, भूगर्भीय परिस्थितियों और आसपास के जलस्रोतों की निगरानी रिपोर्ट का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
इसके बावजूद एक बुनियादी सवाल का जवाब वेकोली प्रबंधन और संबंधित प्रशासन को देना चाहिए: खदानों से निकलने वाले पानी की मात्रा कितनी है, उसका कितना हिस्सा औद्योगिक उपयोग, धूल नियंत्रण, सिंचाई या अन्य अनुमत प्रयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है और कितना पानी बिना उपयोग के छोड़ा जाता है? यदि उपलब्ध पानी का सुरक्षित एवं पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप पुनः उपयोग संभव है, तो उसके लिए समयबद्ध योजना क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए?
पानी की कमी से जूझ रहे क्षेत्र में जल-प्रबंधन की अनदेखी को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा। खनन से लाभ कमाने वाली संस्थाओं की पर्यावरणीय जिम्मेदारी और स्थानीय समुदायों के हितों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।
अमलनाला और पकड़ीगुड्डम के पानी पर किसानों का सवाल
कोरपना तहसील में अमलनाला और पकड़ीगुड्डम जैसे जलाशय किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय आरोप है कि इन जलस्रोतों के पानी का एक बड़ा हिस्सा सीमेंट उद्योगों को दिया जाता है, जबकि आसपास के किसानों को पर्याप्त सिंचाई सुविधा नहीं मिलती। इस दावे की पुष्टि के लिए जलाशयों की स्वीकृत क्षमता, उपलब्ध जलभंडार, उद्योगों को आवंटित पानी, वास्तविक उठाव, सिंचाई के लिए निर्धारित हिस्से और वितरण संबंधी सरकारी आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
यदि जल-वितरण में उद्योगों को प्राथमिकता दी गई है और किसानों की जरूरतों की अनदेखी हुई है, तो यह गंभीर नीतिगत प्रश्न है। उद्योगों को पानी देना अपने आप में गलत नहीं है; रोजगार, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों के लिए पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन जल-वितरण की नीति पारदर्शी, न्यायसंगत और दीर्घकालीन जल-सुरक्षा के अनुरूप होनी चाहिए। पेयजल की जरूरत, कृषि की अनिवार्यता, उपलब्ध जलभंडार और पर्यावरणीय आवश्यकताओं को दरकिनार करके किसी एक क्षेत्र को अनुचित लाभ देना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
यदि उद्योगों के लिए पानी उपलब्ध है, लेकिन किसानों की फसलें सिंचाई के अभाव में नष्ट हो रही हैं, तो प्रशासन को जल-वितरण के नियमों और प्राथमिकताओं का सार्वजनिक स्पष्टीकरण देना चाहिए। किसानों के हिस्से के पानी पर सवाल उठाना उद्योग-विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग की मांग है।
तीस साल से अधूरी परियोजनाएं: विकास के दावों की असली परीक्षा
राजुरा क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और जलाशय संबंधी कार्यों के अधूरे रहने की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं। स्थानीय विवरणों के अनुसार, राजुरा में प्रस्तावित या प्रगतिरत बड़े जलाशय संबंधी कार्य दशकों से लंबित हैं, जिसके कारण अपेक्षित सिंचाई क्षमता विकसित नहीं हो सकी। इन परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति, स्वीकृति वर्ष, संशोधित लागत, खर्च की गई राशि, अधूरे कार्यों और लाभान्वित होने वाले गांवों की जानकारी संबंधित विभागों से प्राप्त की जानी चाहिए।
किसी परियोजना का वर्षों तक अधूरा रहना केवल निर्माण कार्य की देरी नहीं है। इसका अर्थ है कि किसानों को अपेक्षित पानी नहीं मिला, सार्वजनिक धन का पूरा लाभ नहीं पहुंचा और हर वर्ष सूखे का जोखिम बना रहा। यदि लागत बढ़ती रही और सिंचाई क्षमता विकसित नहीं हुई, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। आखिर बजट, ठेके, प्रशासनिक स्वीकृतियां और जनप्रतिनिधियों के आश्वासन किस काम के, यदि खेतों तक पानी ही नहीं पहुंचता?
जिवती तहसील का पठारी और पहाड़ी भूगोल जल-संचय तथा सिंचाई को तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण बना सकता है। लेकिन भौगोलिक कठिनाई को स्थायी बहाने में बदल देना समाधान नहीं है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लघु जलाशय, वर्षाजल संचयन, सौर ऊर्जा आधारित लिफ्ट सिंचाई, सामुदायिक जल-संरक्षण और उपयुक्त सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों की व्यवहार्यता का अध्ययन किया जा सकता है।
गोंडपिपरी तहसील में वर्धा नदी पर लिफ्ट सिंचाई योजना को लेकर भी स्थानीय स्तर पर यह कहा जाता है कि पूर्व विधायक अधिवक्ता Wamanrao Chatap के प्रयासों से योजना आगे बढ़ी, लेकिन बाद में उसका अपेक्षित क्रियान्वयन नहीं हो सका। इस दावे की पुष्टि परियोजना के सरकारी अभिलेखों, स्वीकृति, निर्माण स्थिति और वर्तमान सिंचाई क्षमता से की जानी चाहिए। यदि योजना अधूरी है, तो जिम्मेदार विभाग को उसकी वर्तमान स्थिति और उसे पूरा करने की समयसीमा स्पष्ट करनी चाहिए।
बैराज निर्माण का प्रस्ताव: समाधान मौजूद, इच्छाशक्ति कहां?
पैनगंगा, वर्धा और इरई नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बैराज तथा संबंधित सिंचाई प्रणालियां विकसित करने की मांग क्षेत्र में लंबे समय से उठती रही है। पूर्व विधायक स्वर्गीय Prabhakarrao Mamulkar और पूर्व सांसद Nareshbabu Puglia द्वारा इस संबंध में राज्य सरकार से पत्राचार किए जाने का उल्लेख स्थानीय विवरणों में मिलता है। इन पत्रों, सरकारी प्रतिक्रियाओं और प्रस्तावों की वर्तमान स्थिति सामने आनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पहल किस स्तर तक पहुंची और आगे क्यों नहीं बढ़ी।
यदि तकनीकी, पर्यावरणीय और आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य पाया जाए, तो नदी आधारित जल-संचय परियोजनाएं राजुरा, बल्लारपुर और चंद्रपुर सहित आसपास के क्षेत्रों तथा नदी किनारे बसे गांवों की पेयजल और सिंचाई जरूरतों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। लेकिन बैराज निर्माण को तत्काल और निर्विवाद समाधान मान लेना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए जल उपलब्धता का आकलन, पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन की संभावना, नदी के प्राकृतिक प्रवाह, अंतरराज्यीय या अंतर-जिला जल उपयोग संबंधी प्रावधानों और परियोजना की लागत का अध्ययन जरूरी है।
सही रास्ता यह है कि राज्य सरकार स्वतंत्र तकनीकी सर्वेक्षण कराए, प्राथमिकता वाले स्थलों का चयन करे, लागत और लाभ का आकलन सार्वजनिक करे तथा परियोजनाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना घोषित करे। केवल पत्राचार, घोषणाओं और चुनावी भाषणों से पानी खेतों तक नहीं पहुंचता।
भाजपा नेतृत्व के सामने सीधी चुनौती: इच्छाशक्ति है तो परिणाम दिखाइए!
वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के साथ-साथ क्षेत्र में BJP के विधायक की भूमिका महत्वपूर्ण है। राज्य के मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis के नेतृत्व में सरकार के पास नीतिगत निर्णय लेने, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने और व्यवहार्य परियोजनाओं के लिए वित्तीय प्रावधान तलाशने का अवसर है। ऐसे में राजुरा विधानसभा क्षेत्र की जल-संकट संबंधी समस्याओं को केवल स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बताकर टालना राजनीतिक जवाबदेही से बचने जैसा होगा।
स्थानीय स्तर पर यह अपेक्षा व्यक्त की जा रही है कि क्षेत्र के लिए लगभग ५०० से ६०० करोड़ रुपये तक के निवेश वाली जल-संरक्षण और सिंचाई योजनाओं की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जाए। हालांकि, यह राशि किसी स्वीकृत परियोजना की प्रमाणित लागत नहीं है। वास्तविक आवश्यकता तकनीकी सर्वेक्षण, विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन और वित्तीय मूल्यांकन के बाद ही तय हो सकती है।
लेकिन यदि राजनीतिक नेतृत्व सचमुच इच्छुक है, तो उसे सबसे पहले परियोजनाओं की प्राथमिकता तय करनी चाहिए, अधूरे कार्यों की समीक्षा करनी चाहिए, वेकोली और सीमेंट उद्योगों से संबंधित जल-प्रबंधन के आंकड़े सार्वजनिक कराने चाहिए तथा किसानों के लिए सिंचाई और पेयजल की स्पष्ट समयसीमा घोषित करनी चाहिए। केवल प्रभावशाली राजनीतिक पहुंच का उल्लेख पर्याप्त नहीं है; उस पहुंच का लाभ जनता तक पहुंचना चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व के सामने अब असली परीक्षा है। क्या वह किसानों की पानी संबंधी समस्या को प्राथमिकता देगा, या फिर हर गर्मी में टैंकर, हर खरीफ में फसल नुकसान और हर चुनाव में नए आश्वासनों का वही पुराना चक्र चलता रहेगा?
जनता को आश्वासन नहीं, पानी चाहिए
राजुरा विधानसभा क्षेत्र का संकट केवल बारिश की कमी का परिणाम नहीं माना जा सकता। सीमित सिंचाई क्षमता, अधूरी परियोजनाएं, जल-वितरण को लेकर उठते सवाल, खनन गतिविधियों के जल-प्रभाव और स्थानीय रोजगार की चिंताएं मिलकर एक व्यापक विकास-संकट की तस्वीर पेश करती हैं। इन सभी समस्याओं की स्वतंत्र और तथ्याधारित जांच आवश्यक है, ताकि आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे और वास्तविक जिम्मेदारी तय हो सके।
अब जरूरत है कि संबंधित विभाग जलाशयों की स्थिति, उद्योगों को पानी के आवंटन, खदानों से निकलने वाले पानी, भूजल स्तर, सिंचाई क्षमता और लंबित परियोजनाओं का समेकित विवरण सार्वजनिक करें। किसानों, ग्राम पंचायतों, जल विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों और प्रशासन की भागीदारी से एक समयबद्ध जल-सुरक्षा योजना तैयार की जाए। पेयजल को प्राथमिकता, कृषि के लिए न्यायसंगत जल-वितरण, वर्षाजल संचयन और व्यवहार्य नदी आधारित परियोजनाओं को इस योजना का आधार बनाया जाए।
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र के किसानों को हर वर्ष सूखे की मार झेलनी पड़े, तो केवल मौसम को दोष देकर राजनीतिक नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। सवाल सीधा है: जब नदियां हैं, जलाशय हैं, खदानों से निकलने वाला पानी है और औद्योगिक गतिविधियों से अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है, तब स्थानीय नागरिकों के लिए स्थायी जल-सुरक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं है?
राजुरा को अब घोषणाओं की नहीं, जवाबदेह नियोजन की जरूरत है। किसानों को आश्वासन नहीं, खेतों तक पानी चाहिए; युवाओं को भाषण नहीं, रोजगार चाहिए; और जनता को विकास के दावे नहीं, उनके प्रत्यक्ष परिणाम चाहिए। भाजपा नेतृत्व के पास अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। अब देखना यह है कि वह इस संकट को राजनीतिक प्राथमिकता बनाता है या फिर राजुरा के किसानों को एक और मौसम तक किस्मत के भरोसे छोड़ देता है।
What is the main cause of the water crisis in Rajura?
Why are farmers in Rajura facing irrigation problems despite nearby rivers?
Are coal mines and cement industries accused of contributing to the water crisis?
What measures could help resolve Rajura's water crisis?
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