वर्धा और इरई नदी पर बैराज निर्माण की मांग के बीच सवाल बरकरार; अमलनाला-पकड़ीगुड्डम के पानी पर उद्योगों का कितना हक, किसानों के हिस्से में कितनी कटौती?
Barrage Project | चंद्रपुर | अपेक्षा से कम बारिश के कारण आगामी गर्मियों में संभावित जलसंकट की आशंका को देखते हुए पूर्व सांसद नरेश पुगलिया ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर वर्धा नदी पर दो और इरई नदी पर एक बैराज बनाने की मांग की है। मांग उचित हो सकती है, लेकिन इसके साथ एक बुनियादी सवाल भी खड़ा होता है कि, जब जिले में उद्योगों की जलापूर्ति के लिए नए बैराज बनाने की जरूरत महसूस हो रही है, तब किसानों की सिंचाई के लिए निर्मित जलाशयों के पानी के उपयोग और वितरण का हिसाब कौन देगा?
चंद्रपुर जिले में सीमेंट उद्योगों सहित अनेक औद्योगिक इकाइयों की मौजूदगी के कारण पानी की मांग लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में उद्योगों की जलापूर्ति के लिए केवल सरकारी खजाने पर निर्भर रहने के बजाय संबंधित उद्योगों की वित्तीय भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। जिन उद्योगों को जलसंसाधनों से प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलता है, उनकी जिम्मेदारी भी जलसंग्रहण और जलसंवर्धन के बुनियादी ढांचे के निर्माण में तय की जानी चाहिए। हालांकि, किसी उद्योग की वास्तविक जलखपत, उसकी भुगतान संबंधी जिम्मेदारी और प्रस्तावित बैराज की लागत का आकलन आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, कोरपना तहसील के अमलनाला और पकड़ीगुड्डम जलाशयों के संदर्भ में किसानों के सिंचाई जल और औद्योगिक जलापूर्ति के बीच प्राथमिकताओं का प्रश्न भी उठता रहा है। यदि सिंचाई के लिए निर्मित जलाशयों से किसानों की जरूरतों में कटौती करके सीमेंट उद्योगों को पानी दिया जा रहा है, तो संबंधित विभाग को जल आवंटन, स्वीकृत मात्रा, वास्तविक आपूर्ति और सिंचाई पर पड़ने वाले प्रभाव का सार्वजनिक हिसाब देना चाहिए। इस संबंध में आधिकारिक अभिलेखों की जांच और स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
विडंबना यह है कि जलसंकट की आशंका सामने आते ही नए बैराज की मांग तो उठती है, लेकिन उपलब्ध जलसंसाधनों के वितरण में किसानों के हितों की रक्षा, उद्योगों की जवाबदेही और दीर्घकालीन सिंचाई व्यवस्था जैसे सवालों पर उतनी ही मुखर राजनीतिक पहल दिखाई देनी चाहिए। उद्योगों को पानी देना विकास की जरूरत हो सकती है, लेकिन उस विकास की कीमत किसानों की सिंचाई से वसूली जाए, तो नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विदर्भ में सिंचाई के अनुशेष का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। ऐसे में मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis के नेतृत्व वाली सरकार के सामने केवल नए निर्माण की घोषणा करने की नहीं, बल्कि उपलब्ध जलसंसाधनों के न्यायसंगत वितरण, उद्योगों की सहभागिता और सिंचाई परियोजनाओं के प्रभावी प्रबंधन की भी जिम्मेदारी है।
पूर्व सांसद नरेश पुगलिया की बैराज निर्माण की मांग के साथ अब यह सवाल भी जुड़ता है कि उद्योगों की पानी की जरूरतों के लिए नए संसाधन जुटाने की पहल जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी किसानों के हिस्से के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। सरकार, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को स्पष्ट करना चाहिए कि नए बैराजों का वित्तपोषण कैसे होगा, औद्योगिक जलापूर्ति की जिम्मेदारी कौन उठाएगा और किसानों की सिंचाई के पानी में किसी भी तरह की अनुचित कटौती रोकने के लिए क्या ठोस व्यवस्था की जाएगी। बैराज बनाना समाधान का एक हिस्सा है; पानी का न्यायसंगत बंटवारा और उद्योगों की जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है। अन्यथा जलसंकट का समाधान खोजने की कवायद में किसानों के हिस्से का पानी फिर किसी दूसरे की प्यास बुझाने में खर्च होने का खतरा बना रहेगा।
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