८५ प्रतिशत कृषि भूमि सिंचाई से वंचित; आखिर किसानों के पानी पर उद्योगों का अधिकार किसने किया तय?
Rajura Irrigation Crisis | चंद्रपुर | जिले का राजुरा विधानसभा क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध होने के बावजूद सिंचाई और पेयजल के संकट से जूझ रहा है। एक ओर इस क्षेत्र में कोयले के विशाल भंडार, सीमेंट उद्योग और पैनगंगा, वर्धा तथा इरई जैसी नदियां मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों किसान आज भी अपनी फसलों के लिए मानसून की बारिश पर निर्भर हैं। विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र की धरती से प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर खनिज संपदा का दोहन होता है, उसी क्षेत्र के किसानों को अपनी कृषि भूमि सींचने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति केवल प्राकृतिक परिस्थितियों का परिणाम नहीं, बल्कि सिंचाई नियोजन, जल प्रबंधन, परियोजनाओं के क्रियान्वयन और औद्योगिक जल उपयोग की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
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उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राजुरा विधानसभा क्षेत्र का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग २,३५,८११ हेक्टेयर है। इसमें १,३२,४३६ हेक्टेयर भूमि कृषि क्षेत्र के अंतर्गत आती है। लेकिन इनमें से खरीफ फसल के दौरान केवल १९,२६० हेक्टेयर कृषि भूमि को ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। अर्थात कुल कृषि क्षेत्र का लगभग १४.५ प्रतिशत हिस्सा ही इस सुविधा के दायरे में आता है। शेष लगभग ८५.५ प्रतिशत कृषि भूमि सिंचाई के लिए पर्याप्त व्यवस्था से वंचित है। यह आंकड़ा क्षेत्र की कृषि व्यवस्था की वास्तविक चुनौती को उजागर करता है। हालांकि, इन आंकड़ों का तहसीलवार और परियोजनावार सरकारी अभिलेखों से सत्यापन आवश्यक है।
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राजुरा, कोरपना, जिवती और गोंडपिपरी तहसीलों के लगभग ४७२ गांवों और बस्तियों में फैले इस क्षेत्र में खेती की स्थिति बेहद चिंताजनक है। मानसून के कुछ महीनों को छोड़ दिया जाए तो वर्ष के शेष समय में खेती के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने वाली कोई पर्याप्त व्यवस्था अधिकांश किसानों के पास नहीं है। रबी और ग्रीष्मकालीन फसलें लेने की संभावनाएं सीमित हैं। नतीजतन किसानों की आर्थिक स्थिति वर्षा की अनिश्चितता से सीधे प्रभावित होती है। इस वर्ष खरीफ फसल को हुए नुकसान ने इस संकट की गंभीरता और बढ़ा दी है। कई इलाकों में किसानों के सामने खेती की लागत निकालने तक की चुनौती खड़ी हो गई है।प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और कृषि क्षेत्र की बदहाली के बीच का यह विरोधाभास अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन चुका है।
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राजुरा विधानसभा क्षेत्र में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (वेकोलि) के बल्लारपुर क्षेत्र की छह प्रमुख खदानें संचालित हैं। इनमें बल्लारपुर भूमिगत खदान, बल्लारपुर योजना, ढोपटाला, सास्ती, गौरी-पौनी विस्तार और पौनी-२ जैसी खदानें शामिल हैं। वेकोलि के आधिकारिक विवरण के अनुसार, बल्लारपुर क्षेत्र की वार्षिक कोयला उत्पादन क्षमता १३.०८ मिलियन टन बताई गई है और यहां ३५,००० से अधिक कर्मचारियों का कार्यबल है। यह आंकड़ा इस क्षेत्र में कोयला उद्योग के व्यापक आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव को दर्शाता है।
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लेकिन इस औद्योगिक विकास के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में कितना लाभ मिला, यह जांच का विषय है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप उठता रहा है कि खदानों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिलता और बाहरी राज्यों के युवाओं को अधिक अवसर दिए जाते हैं। हालांकि, बाहरी राज्यों के कर्मचारियों का ७० प्रतिशत होने का दावा अभी उपलब्ध प्रमाणों से पुष्ट नहीं है। इसकी वास्तविकता जानने के लिए वेकोलि से खदानवार कुल कर्मचारियों, स्थानीय एवं गैर-स्थानीय नियुक्तियों, स्थायी कर्मचारियों, ठेका श्रमिकों तथा रोजगार में स्थानीय युवाओं की हिस्सेदारी का आधिकारिक विवरण सार्वजनिक करना आवश्यक है।
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इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न खदानों से निकलने वाले पानी के उपयोग और उसके प्रबंधन का है। कोयला खदानों में भूमिगत जल का प्रवेश रोकने और खनन कार्य सुरक्षित रखने के लिए पानी की निकासी की जाती है। यह पानी यदि उचित शोधन, संग्रहण और पुनः उपयोग की व्यवस्था के माध्यम से आसपास के गांवों, जलाशयों तथा कृषि के लिए उपलब्ध कराया जाए तो क्षेत्र की जल समस्या कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके लिए प्रत्येक खदान का जल निकासी, उपयोग, पुनर्चक्रण और जलाशयों में छोड़े जाने वाले पानी का वास्तविक हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
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यह कहना भी उचित नहीं होगा कि क्षेत्र के भूजल स्तर में गिरावट का एकमात्र कारण कोयला खदानें हैं। इसके लिए भूजल सर्वेक्षण विभाग के वर्षवार आंकड़े, खदानों के पर्यावरण प्रभाव आकलन और जलस्तर की निगरानी रिपोर्टों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी है। वर्ष २००७ में बल्लारपुर भूमिगत खदान के विस्तार को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में प्रतिदिन १५,३२५ घनमीटर पानी की आवश्यकता दर्ज की गई थी। इसी दस्तावेज में खदान के पानी के उपयोग और भूजल संबंधी स्थितियों का विवरण भी दिया गया था। यह पुराना दस्तावेज है, इसलिए इसे वर्तमान जल उपयोग का आंकड़ा नहीं माना जा सकता; लेकिन इससे स्पष्ट होता है कि खनन उद्योग में पानी की आवश्यकता और उसके प्रबंधन का प्रश्न नया नहीं है।
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महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की वर्ष २०२४ की एक जनसुनवाई के अभिलेख में भी तिरवंजा गांव के तालाब में पानी की उपलब्धता और गर्मियों में खदान के जलसंग्रह से पानी की आपूर्ति कम होने संबंधी ग्रामीणों की आपत्ति दर्ज है। वेकोलि की ओर से जवाब दिया गया था कि गर्मियों में खदान के जलसंग्रह का स्तर कम होने के कारण तालाब में पानी छोड़ने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता। यह अभिलेख खदानों के पानी और स्थानीय जलस्रोतों के बीच संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
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अर्थात सवाल केवल पानी की निकासी का नहीं, बल्कि इस प्राकृतिक संसाधन के सार्वजनिक हित में अधिकतम उपयोग का भी है। जिस क्षेत्र में गर्मियों में पेयजल के लिए ग्रामीणों को परेशानी उठानी पड़ती है, वहां खदानों से निकलने वाले पानी के नियोजन की स्वतंत्र समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
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राजुरा विधानसभा क्षेत्र के आसपास पैनगंगा और वर्धा जैसी प्रमुख नदियां बहती हैं। इरई नदी भी चंद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों के जल संसाधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन नदियों के किनारे सैकड़ों गांव बसे हैं और हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि स्थित है। इसके बावजूद नदी किनारे के किसानों को सालभर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं होना विकास नियोजन की गंभीर कमी को उजागर करता है।
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नदी का पानी केवल बरसात के दिनों में बहकर आगे निकल जाए और उसके बाद आसपास के गांवों में पेयजल तथा खेतों में सिंचाई के लिए संकट उत्पन्न हो, तो यह जलसंसाधन प्रबंधन की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न है। उचित स्थानों पर बैराज, लघु सिंचाई परियोजनाएं, जलसंग्रह संरचनाएं और लिफ्ट सिंचाई योजनाएं विकसित की जाएं तो इस पानी का उपयोग कृषि और पेयजल दोनों आवश्यकताओं के लिए किया जा सकता है।
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स्थानीय स्तर पर पूर्व विधायक स्वर्गीय प्रभाकर मामुलकर और पूर्व सांसद नरेश बाबू पुगलिया द्वारा वर्धा, पैनगंगा और इरई नदी पर बैराज निर्माण के लिए राज्य सरकार से पत्राचार किए जाने की जानकारी दी जाती है। लेकिन इन प्रयासों का परिणाम आज तक ठोस और व्यापक जलसिंचाई व्यवस्था के रूप में सामने नहीं आया। सवाल यह है कि इन प्रस्तावों पर संबंधित विभागों ने क्या कार्रवाई की? तकनीकी सर्वेक्षण हुआ या नहीं? प्रस्तावों को प्रशासनिक स्वीकृति मिली या नहीं? परियोजनाओं के लिए निधि का प्रावधान क्यों नहीं हुआ? इन प्रश्नों के उत्तर संबंधित सरकारी अभिलेखों से सामने आने चाहिए।
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यदि नदी आधारित जलसंग्रह परियोजनाओं का समय रहते नियोजन और क्रियान्वयन किया गया होता, तो आज अनेक गांवों को पेयजल और किसानों को सिंचाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था मिल सकती थी। केवल पत्राचार, आश्वासन और चुनावी घोषणाओं से जलसंकट का समाधान संभव नहीं है।
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कोरपना तहसील में अमलनाला और पकड़ीगुड्डम दो बड़े जलाशय हैं। स्थानीय स्तर पर किसानों का आरोप है कि इन जलाशयों में उपलब्ध पानी का लगभग ५० प्रतिशत हिस्सा सीमेंट उद्योगों को दिया जा रहा है। यदि यह जानकारी सही है, तो यह केवल जल वितरण का मामला नहीं, बल्कि कृषि और औद्योगिक आवश्यकताओं के बीच प्राथमिकता निर्धारित करने का गंभीर प्रश्न है।
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सीमेंट उद्योग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन औद्योगिक विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कृषि और ग्रामीण पेयजल की जरूरतें पीछे छूट जाएं। उद्योगों को पानी देने के निर्णय में जलाशयों की वास्तविक क्षमता, वर्षभर की आवक, किसानों की सिंचाई की मांग, पेयजल का आरक्षित हिस्सा और उद्योगों को दी गई आवंटित मात्रा का पारदर्शी हिसाब होना चाहिए।
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जलसंपदा विभाग को अमलनाला और पकड़ीगुड्डम जलाशयों की स्वीकृत जल वितरण योजना, औद्योगिक जल आवंटन, वास्तविक उठाव, सिंचाई के लिए छोड़े गए पानी और शेष जलसंग्रह का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसानों के लिए निर्धारित पानी में किसी प्रकार की कटौती की गई है या नहीं। बिना आधिकारिक दस्तावेजों के औद्योगिक उपयोग को किसानों के पानी की कटौती का स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस आरोप की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
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जिवती तहसील की भौगोलिक स्थिति भी सिंचाई के लिए बड़ी चुनौती है। पठारी और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां जलसंग्रह और पानी को खेतों तक पहुंचाने की योजनाओं की विशेष आवश्यकता है। इसके बावजूद पर्याप्त जलसिंचाई व्यवस्था का अभाव किसानों को वर्षा आधारित खेती तक सीमित रखता है।
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राजुरा तहसील में भी दो बड़े जलाशय होने के बावजूद सिंचाई की समस्या समाप्त नहीं हुई है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, एक महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना का काम लगभग तीन दशकों से अधूरा पड़ा है। परियोजनाओं पर सार्वजनिक धन खर्च होने के बाद भी यदि किसानों को अपेक्षित पानी नहीं मिलता, तो निर्माण की प्रगति, तकनीकी अड़चनों, संशोधित लागत, ठेकेदारों की जवाबदेही और प्रशासनिक निर्णयों की जांच होनी चाहिए। अधूरी परियोजनाएं केवल सरकारी फाइलों में दर्ज निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि उन किसानों की वर्षों से लंबित उम्मीदें हैं जिनकी फसलें पानी के अभाव में प्रभावित होती हैं।
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गोंडपिपरी तहसील में वर्धा नदी पर लिफ्ट सिंचाई योजना पूर्व विधायक एड. वामनराव चटप के प्रयासों से शुरू किए जाने की जानकारी है। लेकिन उनके बाद इस योजना को पूरी क्षमता से कार्यान्वित नहीं किया जा सका। परिणामस्वरूप क्षेत्र के किसानों को आज भी मुख्य रूप से खरीफ फसल पर निर्भर रहना पड़ता है। इस परियोजना की वर्तमान स्थिति, तकनीकी क्षमता, सिंचाई क्षेत्र, लंबित कार्य और आवश्यक निधि का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
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राजुरा, बल्लारपुर और चंद्रपुर के आसपास बहने वाली वर्धा, पैनगंगा और इरई नदियों पर वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर बैराज निर्माण की संभावनाओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यदि उपयुक्त स्थानों पर बैराज और जलसंग्रह संरचनाएं विकसित की जाती हैं, तो आसपास के सैकड़ों गांवों की पेयजल समस्या कम करने के साथ हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।
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इससे किसानों को केवल खरीफ फसल पर निर्भर रहने की मजबूरी से राहत मिल सकती है। रबी और ग्रीष्मकालीन फसलों की संभावनाएं बढ़ेंगी, कृषि उत्पादन में स्थिरता आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। हालांकि, बैराज निर्माण का निर्णय केवल नदी में पानी की उपलब्धता देखकर नहीं लिया जा सकता। इसके लिए जल उपलब्धता का वार्षिक आकलन, पर्यावरणीय प्रभाव, भू-अधिग्रहण, नदी के प्रवाह पर प्रभाव, ऊपरी और निचले क्षेत्रों के जल अधिकार तथा आर्थिक व्यवहार्यता का अध्ययन अनिवार्य है।
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इस संबंध में महाराष्ट्र के जलसंपदा विभाग को विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार कराना चाहिए। नदीवार जलसंग्रह क्षमता, संभावित सिंचाई क्षेत्र, अनुमानित लागत और लाभार्थी गांवों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की समयसीमा भी निर्धारित होनी चाहिए।
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इस पूरे संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक जवाबदेही है। राजुरा विधानसभा क्षेत्र में सिंचाई की समस्या कोई अचानक पैदा हुई परिस्थिति नहीं है। वर्षों से अधूरी परियोजनाएं, सीमित सिंचाई क्षेत्र, गर्मियों में पेयजल संकट और औद्योगिक जल उपयोग को लेकर उठते सवाल यह बताते हैं कि क्षेत्रीय जल नियोजन को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिली।
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आज महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है और राजुरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी भाजपा के विधायक कर रहे हैं। ऐसे में क्षेत्र की सिंचाई और पेयजल समस्याओं को शासन के समक्ष प्रभावी ढंग से रखने तथा ठोस निर्णय कराने की राजनीतिक और जनप्रतिनिधि संबंधी जिम्मेदारी पर सार्वजनिक चर्चा स्वाभाविक है।
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राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय, जलसंपदा विभाग की योजनाएं, विदर्भ के विकास के लिए उपलब्ध निधि तथा खनन और औद्योगिक क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र के लिए व्यापक जलसिंचाई योजना तैयार की जा सकती है। लेकिन केवल सरकार में अपनी पार्टी की भागीदारी या वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच होने से परियोजनाएं अपने आप पूरी नहीं होतीं। इसके लिए ठोस प्रस्ताव, तकनीकी व्यवहार्यता, प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय प्रावधान और समयबद्ध क्रियान्वयन आवश्यक हैं।
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एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वर्ष २०१०-११ के लिए प्रकाशित महाराष्ट्र शासन के चंद्रपुर जिला सामाजिक एवं आर्थिक सांख्यिकी अभिलेख में राजुरा तहसील का शुद्ध सिंचित क्षेत्र २,०३९ हेक्टेयर और सकल सिंचित क्षेत्र २,२९४ हेक्टेयर दर्ज था। यह आंकड़ा २०००-०१ के संदर्भ वर्ष का है, इसलिए इसे वर्तमान स्थिति नहीं माना जा सकता। लेकिन यह स्पष्ट करता है कि सिंचाई का पिछड़ापन लंबे समय से प्रशासनिक चिंता का विषय रहा है। आज आवश्यकता है कि सरकार नवीनतम तहसीलवार सिंचाई आंकड़े सार्वजनिक करे, ताकि विकास के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर सामने आ सके।
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राजुरा विधानसभा क्षेत्र के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यहां कोयला है, सीमेंट उद्योग हैं, विशाल नदियां हैं और जलसंग्रह की संभावनाएं भी मौजूद हैं, तो फिर किसान सिंचाई के लिए तरस क्यों रहे हैं? उद्योगों के लिए पानी की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने की योजनाएं वर्षों तक अधूरी क्यों रहती हैं? खदानों से निकलने वाले पानी का समुचित उपयोग सुनिश्चित करने की व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई देती? नदी किनारे बसे गांवों को भी गर्मियों में पेयजल के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है?
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इन सवालों का उत्तर केवल प्राकृतिक परिस्थितियों, कम बारिश या किसानों की किस्मत पर जिम्मेदारी डालकर नहीं दिया जा सकता। जलसंपदा विभाग, भूजल सर्वेक्षण विभाग, वेकोलि, संबंधित औद्योगिक प्रतिष्ठानों, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अपने-अपने स्तर पर जवाब देना होगा।
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विधायक देवराव भोंगले के सामने भी यह एक महत्वपूर्ण जनहित का विषय है। उन्हें वर्धा, पैनगंगा और इरई नदी पर बैराज निर्माण, अमलनाला और पकड़ीगुड्डम जलाशयों के जल वितरण की समीक्षा, अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने तथा वेकोलि के खदान जल के सार्वजनिक उपयोग के लिए ठोस पहल करनी चाहिए। इसके लिए लगभग ५०० से ६०० करोड़ रुपये के संभावित निवेश की चर्चा सामने आती है, लेकिन वास्तविक लागत का निर्धारण तकनीकी सर्वेक्षण और विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन के बाद ही किया जा सकता है। राजुरा की धरती से कोयला निकालकर उद्योगों को ऊर्जा मिल रही है, सीमेंट उद्योगों को पानी मिल रहा है, लेकिन उसी धरती पर खेती करने वाले किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। यह विरोधाभास कब समाप्त होगा?
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अब क्षेत्र को आश्वासनों की नहीं, बल्कि जलसंसाधनों के न्यायसंगत वितरण, पारदर्शी नियोजन और समयबद्ध परियोजना क्रियान्वयन की आवश्यकता है। प्राकृतिक संपदा से समृद्ध राजुरा विधानसभा क्षेत्र को अकाल, बेरोजगारी और प्रदूषण की त्रासदी से बाहर निकालना संभव है, बशर्ते विकास का केंद्र केवल उद्योग नहीं, बल्कि किसान, गांव और आम नागरिक भी हों। क्योंकि जिस क्षेत्र में नदियां बहती हों, वहां किसान की खेती पानी के अभाव में सूखना केवल प्राकृतिक विडंबना नहीं, बल्कि शासन और नियोजन के सामने खड़ा एक गंभीर सार्वजनिक प्रश्न है।
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