ओवरलोड परिवहन, उड़ती धूल और नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता; डब्ल्यूसीएल प्रबंधन तथा प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग
WCL Pollution | चंद्रपुर | कोयला उत्पादन से ऊर्जा और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, लेकिन इस विकास की कीमत यदि स्थानीय नागरिकों को प्रदूषण, धूल और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के रूप में चुकानी पड़े, तो विकास की अवधारणा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पर्यावरण संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने नियम निर्धारित किए हैं। खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तें, प्रदूषण नियंत्रण के प्रावधान और कोयला परिवहन के दौरान सुरक्षा संबंधी निर्देश भी लागू होते हैं। इसके बावजूद राजुरा तहसील के अंतर्गत वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (डब्ल्यूसीएल) के बल्लारपुर क्षेत्र में स्थित गोवरी डीप तथा पौनी-गोवरी उपक्षेत्र की गतिविधियों को लेकर पर्यावरणीय अनुपालन पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कोयला उत्पादन और परिवहन के दौरान उड़ने वाली धूल, भारी वाहनों की आवाजाही तथा कथित ओवरलोड परिवहन से आसपास के नागरिकों के जीवन और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इन क्षेत्रों में वर्तमान प्रदूषण स्तर, वाहनों के वास्तविक भार और नियमों के उल्लंघन की स्थिति की स्वतंत्र जांच कर विशिष्ट उल्लंघन को प्रमाणित कर तथ्य सामने लाये जाये। यही कारण है कि संबंधित विभागों द्वारा निष्पक्ष निरीक्षण और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाने वाले जांच परिणामों की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
इस मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डब्ल्यूसीएल WCL की आधिकारिक वेबसाइट पर गोवरी डीप खदान से संबंधित पर्यावरणीय मंजूरी के दस्तावेज उपलब्ध हैं। कंपनी ने अक्टूबर २०२५ से मार्च २०२६ की अवधि की अनुपालन रिपोर्ट भी प्रकाशित की है। इससे स्पष्ट है कि संबंधित परियोजना के पर्यावरणीय अनुपालन का औपचारिक रिकॉर्ड मौजूद है। अब सवाल यह है कि इन दस्तावेजों में दर्ज शर्तों का जमीनी स्तर पर कितना पालन हो रहा है और स्थानीय नागरिकों की शिकायतों का समाधान किस स्तर पर किया जा रहा है।
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के समक्ष भी चंद्रपुर जिले में खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों का प्रश्न नया नहीं है। मंडल की आधिकारिक रिपोर्टों में कोयला खदानों से उत्पन्न धूल को नियंत्रित करने के लिए जल छिड़काव और मिस्ट फॉगिंग जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर, पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों में खनिज परिवहन के दौरान वाहनों को तिरपाल से ढकने, उचित भार रखने और वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण जैसे उपायों का प्रावधान भी दर्ज है।
ऐसे में यदि गोवरी डीप और पौनी-गोवरी क्षेत्र में इन उपायों के पालन को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं, तो संबंधित अधिकारियों का दायित्व केवल आश्वासन देना नहीं, बल्कि स्थल निरीक्षण, प्रदूषण मापन और परिवहन व्यवस्था की जांच के माध्यम से वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना है। खदान प्रबंधन को भी यह बताना चाहिए कि धूल नियंत्रण के लिए कितने जल टैंकर और स्प्रिंकलर कार्यरत हैं, परिवहन मार्गों की नियमित सफाई होती है या नहीं तथा ओवरलोड वाहनों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई है।
विडंबना यह है कि कोयला उत्पादन के आंकड़े औद्योगिक प्रगति का प्रमाण बनकर प्रस्तुत किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय पर्यावरण की स्थिति और नागरिकों की शिकायतों का हिसाब भी उतनी ही पारदर्शिता से सामने आना चाहिए। आखिर खनन परियोजनाओं का उद्देश्य आर्थिक विकास है, न कि नागरिकों को प्रदूषण के जोखिम के बीच जीवन बिताने के लिए विवश करना।
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल, जिला प्रशासन, खनन विभाग और डब्ल्यूसीएल के वरिष्ठ अधिकारियों को गोवरी डीप तथा पौनी-गोवरी क्षेत्र में संयुक्त निरीक्षण कराना चाहिए। वायु गुणवत्ता के नमूनों की स्वतंत्र जांच, परिवहन मार्गों का निरीक्षण, वाहनों के भार की जांच और पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों के अनुपालन की समीक्षा कर निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए। यदि जांच में उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और दोषी ठेकेदारों के विरुद्ध लागू कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण के नियम बनाकर फाइलों में सुरक्षित रख देना पर्याप्त नहीं है। उनकी प्रभावशीलता का प्रमाण नागरिकों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित परिवेश और जवाबदेह प्रशासन के रूप में मिलना चाहिए। स्थानीय नागरिकों की ओर से उठाए जा रहे सवालों का उत्तर आंकड़ों, निरीक्षण रिपोर्टों और ठोस कार्रवाई से दिया जाना चाहिए। कोयला उत्पादन की निरंतरता महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन कानून के पालन और जनस्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। आखिर सवाल सीधा है की, यदि पर्यावरणीय नियमों का पालन हो रहा है, तो उसकी पारदर्शी पुष्टि सामने आए; और यदि उल्लंघन हो रहा है, तो जिम्मेदारों को जवाबदेह बनाया जाए।
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