Chandrapur Journalist Threat | विश्लेषणात्मक लेख के बाद पत्रकार को जान से मारने की धमकी

Mahawani
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Middle-aged Indian man in a red Nehru jacket standing on a semi-urban street with shops, pedestrians, and parked vehicles in the background, natural daylight, serious expression, editorial-style photograph.

अपहरण प्रयास के आरोपी और सांसद के करीबी पदाधिकारी पर गंभीर आरोप; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला या राजनीतिक संरक्षण का संकेत?

Chandrapur Journalist Threat | चंद्रपुर | में राजनीतिक गतिविधियों के बीच एक गंभीर और चिंताजनक प्रकरण सामने आया है, जिसने पत्रकारिता की स्वतंत्रता, राजनीतिक संरक्षण और आपराधिक आरोपों के बीच संबंधों पर कई कठोर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक लिमेशकुमार माणिक जंगम ने आरोप लगाया है कि उनके एक विश्लेषणात्मक लेख के प्रकाशन के तुरंत बाद उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। आरोपित व्यक्ति सौरभ ठोंबरे बताए जा रहे हैं, जो महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस सेवा दल की चंद्रपुर जिला यंग ब्रिगेड के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हैं और जिनके विरुद्ध पूर्व में अपहरण के प्रयास का मामला दर्ज है।


लिमेश कुमार के अनुसार, दिनांक १४ फरवरी २०२६ को उनके द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक लेख में यह प्रश्न उठाया गया था कि अपहरण के प्रयास के मामले में दर्ज एफआईआर के बावजूद महज पंद्रह दिनों के भीतर संबंधित आरोपी को राजनीतिक संगठन में महत्वपूर्ण पद कैसे प्रदान किया गया। लेख में यह भी उल्लेख किया गया था कि इस विषय पर मुख्यधारा मीडिया द्वारा अपेक्षित प्रश्न नहीं उठाए गए।


इसी दिन दोपहर १ बजकर २२ मिनट पर कथित रूप से सौरभ ठोंबरे के मोबाइल नंबर से पत्रकार लिमेश कुमार के मोबाइल पर व्हाट्सएप कॉल आया। शिकायत के अनुसार, कॉल उठाते ही उन्हें अश्लील, अपमानजनक और धमकीपूर्ण भाषा में चेतावनी दी गई कि ऐसी खबरें न लिखें, अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे। शिकायत में यह भी आरोप है कि कॉल करने वाले ने स्वयं को “गुंडा” बताते हुए कुछ राजनीतिक नामों का उल्लेख कर संरक्षण होने का दावा किया और जान से मारने की धमकी दी। कुछ ही मिनटों के भीतर दोबारा कॉल किए गए, जिनमें सामान्य कॉल भी शामिल थे। कुल चार कॉल प्राप्त होने की बात कही गई है।


शिकायतकर्ता का कहना है कि वे आरोपी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, न ही पूर्व में कोई संपर्क रहा है। उनका आरोप है कि यह दुस्साहस राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं प्रतीत होता। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है और संबंधित पक्षों की औपचारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।


यह प्रकरण उस पृष्ठभूमि में और गंभीर हो जाता है जब दिनांक २९ जनवरी २०२६ को सावंगी मेघे पुलिस स्टेशन, जिला वर्धा में दर्ज एक प्राथमिकी का संदर्भ सामने आता है। उस मामले में आरोप था कि कांग्रेस से जुड़े एक नगरसेवक राजेश अडूर तथा उनके साथियों की निजी बस को रोककर धमकाया गया और अपहरण का प्रयास किया गया। उक्त एफआईआर में सौरभ ठोंबरे सहित लगभग १२ युवकों के नाम दर्ज होने की जानकारी दी गई है। प्राथमिकी में कथित रूप से यह उल्लेख है कि आरोपियों ने पीड़ितों से कहा कि “हमारे साथ चलो, नहीं तो जान से मार देंगे।”


उक्त प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता की धारा १२६(२), १८९(२), १९०, ३५१(३) एवं ३५२ के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध होने की बात सामने आई है और जांच प्रचलित बताई जा रही है। विधि विशेषज्ञों का मत है कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध गंभीर आपराधिक प्रकरण लंबित हो, तो उसे राजनीतिक संगठन में महत्वपूर्ण दायित्व देना नैतिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से बहस का विषय बन सकता है। हालांकि कानूनन तब तक दोष सिद्ध नहीं माना जाता जब तक न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय न हो।


राजनीतिक दलों द्वारा अपने कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का अधिकार निर्विवाद है, परंतु जब ऐसे नियुक्तियों का संबंध लंबित आपराधिक मामलों से जुड़ता है, तो सार्वजनिक जीवन की शुचिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कांग्रेस स्वयं को महात्मा गांधी की अहिंसात्मक परंपरा से प्रेरित दल के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में आरोपित व्यक्ति को जिला स्तर के पद पर नियुक्त किए जाने से राजनीतिक संदेश क्या जाता है, यह विमर्श का विषय है।


दूसरी ओर, यदि किसी पत्रकार को प्रकाशित लेख के कारण धमकियां मिलती हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद १९(१)(क) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष प्रहार माना जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट कर चुका है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना को दमन से नहीं, तर्क और कानून से उत्तर दिया जाना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व सत्ता और संगठन दोनों से प्रश्न करना है, और प्रश्न पूछना अपराध नहीं हो सकता।


लिमेश कुमार ने अपनी शिकायत में यह भी उल्लेख किया है कि पूर्व में क्षेत्र में कुछ राजनीतिक व्यक्तियों पर हमले और फायरिंग जैसी घटनाओं में प्रभावी जांच को लेकर सवाल उठे थे, जिससे उनकी आशंका और गहरी हुई है। हालांकि इन घटनाओं के संबंध में आधिकारिक स्थिति और न्यायिक प्रगति का परीक्षण अलग विषय है, परंतु शिकायतकर्ता ने इन्हें अपनी सुरक्षा संबंधी चिंता के आधार के रूप में उद्धृत किया है।


इस पूरे प्रकरण में तीन स्तरों पर जांच और उत्तर अपेक्षित हैं। पहला, क्या वास्तव में धमकी भरे कॉल किए गए और यदि हाँ, तो उनकी विधिक जिम्मेदारी किसकी बनती है। दूसरा, क्या लंबित आपराधिक प्रकरण के बावजूद राजनीतिक नियुक्ति का निर्णय नैतिक मानदंडों पर खरा उतरता है। तीसरा, क्या पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक तंत्र पर्याप्त संवेदनशील और सक्रिय है।


कानून स्पष्ट है कि आपराधिक धमकी, अश्लील भाषा और जान से मारने की चेतावनी गंभीर दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं। यदि शिकायत में वर्णित तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं बल्कि सार्वजनिक विमर्श को दबाने का प्रयास माना जाएगा। वहीं, यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं, तो शिकायतकर्ता को भी कानून का सामना करना पड़ेगा। अतः निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच ही इस विवाद का एकमात्र लोकतांत्रिक समाधान है।


चंद्रपुर की यह घटना स्थानीय राजनीति से आगे बढ़कर एक व्यापक प्रश्न को जन्म देती है क्या सत्ता और संगठन से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध उठाए गए प्रश्नों का उत्तर संवाद से दिया जाएगा या दबाव और भय से? लोकतंत्र की सेहत इसी कसौटी पर आंकी जाएगी।


अब दृष्टि प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर है। क्या वे इस शिकायत को विधिवत आपराधिक प्रकरण के रूप में दर्ज कर तथ्यों की जांच करेंगे? क्या संबंधित पक्ष सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखेंगे? और सबसे महत्वपूर्ण क्या एक पत्रकार को अपने विश्लेषणात्मक लेख के कारण भय में जीना पड़ेगा?


इन प्रश्नों के उत्तर ही तय करेंगे कि चंद्रपुर की राजनीति में विधि का शासन प्रबल है या प्रभाव का। लोकतंत्र में कलम को भयभीत करने की हर कोशिश अंततः व्यवस्था की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लगाती है।


What is the Chandrapur journalist threat case about?
A senior journalist alleged receiving death threats after publishing an analytical article questioning the political appointment of a person named in a kidnapping attempt FIR.
Who is accused of issuing the threat?
The complaint names Saurabh Thombre, reportedly a local Congress functionary and an accused in a prior kidnapping attempt case registered in Wardha district. The allegations are currently subject to legal scrutiny.
What legal provisions are linked to the earlier FIR?
The earlier case reportedly includes charges under sections 126(2), 189(2), 190, 351(3), and 352 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, with investigation stated to be ongoing.
Why is this case significant for press freedom?
If verified, the alleged threats raise serious concerns about intimidation of journalists and potential violations of constitutional protections under Article 19(1)(a), which guarantees freedom of speech and expression in India.


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